Subhash aur पलायन" (1941)
सुभाष चंद्र बोस की दुर्लभ कहानी: उनकी साहसिक "महान पलायन" (1941)
सुभाष चंद्र बोस की जिंदगी में ऐसी कई घटनाएं हैं जो उनके अदम्य साहस और क्रांतिकारी दृष्टिकोण को दर्शाती हैं। इनमें से एक दुर्लभ और कम ज्ञात कहानी उनकी ब्रिटिश निगरानी से 1941 में कोलकाता से जर्मनी तक की साहसिक पलायन की है। यह घटना उनकी असाधारण सूझबूझ और देशभक्ति का अद्भुत उदाहरण है।
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गिरफ्तारी और पलायन की योजना
1940 में, ब्रिटिश सरकार ने सुभाष चंद्र बोस को उनके बढ़ते प्रभाव और क्रांतिकारी गतिविधियों के कारण कोलकाता स्थित उनके घर (एल्गिन रोड) में नजरबंद कर दिया। लेकिन बोस का हौसला अडिग था, और उन्होंने ब्रिटिश अधिकारियों को चकमा देकर देश से बाहर जाने की योजना बनाई।
उन्होंने अपने करीबी सहयोगियों, विशेषकर अपने भतीजे शिशिर बोस की मदद से एक गुप्त योजना बनाई।
योजना के तहत, सुभाष चंद्र बोस ने पठान (मुस्लिम व्यापारी) का वेश धारण करने का फैसला किया। उन्होंने अपना सिर मुंडवा लिया, दाढ़ी रख ली, और पारंपरिक पठानी पोशाक पहनी। उन्होंने अपना नाम "जियाउद्दीन" रखा।
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महान पलायन की शुरुआत
16 जनवरी 1941 की रात, शिशिर बोस ने एक जर्मन कार (वांडरर) से सुभाष को कोलकाता से झारखंड के गोमो (अब धनबाद के पास) तक पहुँचाया। उन्होंने मुख्य सड़कों और पुलिस चौकियों से बचने के लिए सुनसान रास्तों का इस्तेमाल किया।
गोमो से, सुभाष ने एक ट्रेन पकड़ी और पेशावर (अब पाकिस्तान में) की ओर रवाना हुए। वहाँ उन्होंने खुद को एक बहरे और गूंगे व्यक्ति के रूप में प्रस्तुत किया ताकि कोई उनसे बातचीत न करे।
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अफगानिस्तान की सीमा पार करना
पेशावर में, क्रांतिकारी भगत राम तलवार ने उनकी मदद की। अफगानिस्तान की सीमा पार करने के लिए, उन्होंने खुद को एक इतालवी नागरिक "ऑरलैंडो मेज़ोट्टा" के रूप में पेश किया।
उन्होंने अफगानिस्तान में कई हफ्ते बिताए, जहाँ ब्रिटिश खुफिया एजेंसियाँ उनकी तलाश में थीं।
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सोवियत संघ और जर्मनी की यात्रा
अफगानिस्तान से, सुभाष ने सोवियत एजेंटों की मदद से मास्को की यात्रा की। वहाँ से, वह बर्लिन (जर्मनी) पहुँचे, जहाँ उन्होंने एडॉल्फ हिटलर और अन्य धुरी राष्ट्रों के नेताओं से मुलाकात की।
जर्मनी में रहते हुए, उन्होंने "फ्री इंडिया लीजन" (आज़ाद हिंद सेना) का गठन किया, जो भारतीय युद्धबंदियों से बनी थी।
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यह कहानी दुर्लभ क्यों है?
सुभाष चंद्र बोस का यह साहसिक पलायन न केवल उनकी बहादुरी बल्कि उनकी योजना बनाने की अद्भुत क्षमता को भी दर्शाता है। यह घटना उनके जीवन के उन पहलुओं को सामने लाती है जो अक्सर उनकी राजनीतिक और सैन्य उपलब्धियों के पीछे छिप जाती हैं।
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महान पलायन की विरासत
इस साहसिक कदम ने न केवल उनके नेतृत्व और साहस को साबित किया बल्कि भारत के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में भी एक अमिट छाप छोड़ी। यह घटना उनकी दृढ़ इच्छाशक्ति और देशभक्ति की भावना का प्रतीक है, जो आज भी लाखों लोगों को प्रेरित करती है।
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