खुद की खोज में, कबीर,पहले कवि ; बिना भाषा ज्ञान

 "कबीर: अरे तुम".


सूरज की पहली किरणें धीरे-धीरे यमुना के पानी पर झिलमिलाने लगी थीं। हल्का-सा कुहासा अभी भी नदी पर तैर रहा था, मानो प्रकृति अपनी चादर समेटने से पहले एक आखिरी आलिंगन देना चाहती हो। नदी के किनारे एक बूढ़े संत, कबीर, अपनी साधना में लीन थे। उनकी आंखें बंद थीं, लेकिन चेहरे पर ऐसी शांति थी जैसे उन्हें सारी सृष्टि का रहस्य ज्ञात हो।


कबीर का जीवन किसी साधारण व्यक्ति का नहीं था। वे सत्य की खोज में निकले एक साधक थे, जो न किसी एक धर्म के थे, न किसी विशेष समुदाय के। उनका ज्ञान सीमाओं से परे था, और उनकी कविताओं में ईश्वर, इंसान और आत्मा के गहरे रहस्य छुपे थे। आज भी उनके भीतर वही प्रश्न गूंज रहे थे, जिनके उत्तर के लिए वे जीवन भर भटकते रहे थे।


अचानक, जैसे किसी अदृश्य स्रोत से एक आवाज आई, "अरे तुम?" यह आवाज धीमी थी, लेकिन उसमें ऐसी शक्ति थी कि कबीर की साधना टूट गई। उन्होंने धीरे-से अपनी आंखें खोलीं और चारों ओर देखा। कहीं कोई नहीं था, पर यह आवाज इतनी स्पष्ट थी, जैसे उनके हृदय के भीतर ही गूंज रही हो।


कबीर मुस्कुराए। यह पहली बार नहीं था जब किसी प्रश्न ने उन्हें इस तरह झकझोर दिया हो। उन्होंने जीवन में अनेक प्रश्नों का सामना किया था, लेकिन यह प्रश्न—"अरे तुम?"—उनकी आत्मा तक को आंदोलित कर गया। यह सिर्फ एक सवाल नहीं था; यह मानो एक दर्पण था जो उन्हें उनकी आत्मा का साक्षात्कार करवा रहा था।


उन्होंने अपने आप से पूछा, "मैं कौन हूँ? क्या मैं इस शरीर तक सीमित हूँ, या मुझमें कोई असीम तत्व है जो इस शरीर के परे है?" कबीर का मानना था कि हर व्यक्ति में एक आत्मा होती है, जो सृष्टि का ही एक अंश होती है। लेकिन ये आत्मा कौन है, इसका स्वरूप क्या है, इस प्रश्न का उत्तर वे स्वयं नहीं जानते थे।


अतीत की ओर लौटते हुए, कबीर ने अपने शुरुआती दिनों को याद किया। वे एक गरीब जुलाहे के घर में पैदा हुए थे और छोटी उम्र से ही उन्होंने जीवन की कठोर सच्चाइयों का सामना किया था। उस समय, समाज विभिन्न धर्मों और जातियों में बंटा हुआ था। लोग एक-दूसरे से कटे-कटे रहते थे, और ईश्वर के नाम पर अनेक विभाजन थे। कबीर ने महसूस किया कि इस सब के बीच इंसान का असली स्वरूप खो गया है। वे जानते थे कि ईश्वर मंदिर या मस्जिद में नहीं, बल्कि हर इंसान के भीतर है।


लेकिन यह खोज आसान नहीं थी। समाज ने उन्हें कई बार ठुकराया, उनकी निंदा की। उनके उपदेश, जो एकता और प्रेम का संदेश देते थे, अक्सर कट्टरपंथियों को पसंद नहीं आते थे। पर कबीर का विश्वास अडिग था। उन्होंने समाज की परवाह नहीं की और अपने साधन पथ पर आगे बढ़ते रहे।


आज, नदी के किनारे बैठे हुए, कबीर को महसूस हुआ कि यह सवाल—"अरे तुम?"—उनके जीवन का सार है। इस एक सवाल में ही उनकी सारी साधना का उद्देश्य समाया हुआ है। यह प्रश्न उन्हें उनकी सीमाओं से बाहर निकलने की चुनौती दे रहा था, उन्हें उस असीम शून्य की ओर देखना सिखा रहा था जहाँ पर हर चीज का अस्तित्व एक में विलीन हो जाता है।


कबीर ने अपने भीतर झाँका। वे अपने जीवन की सभी महत्वपूर्ण घटनाओं को याद करने लगे। कैसे उन्होंने बचपन में पहली बार ईश्वर को महसूस किया था, जब उन्होंने अपनी माँ को प्रार्थना करते हुए देखा था। कैसे एक दिन अपने गुरु, संत रामानंद के शब्दों ने उनके हृदय को प्रकाशित कर दिया था। रामानंद ने उन्हें सिखाया था कि ईश्वर केवल मंदिर में नहीं, बल्कि हर प्राणी में है। उन्होंने कहा था, "ईश्वर को पाने के लिए तुम्हें बाहर नहीं, अपने भीतर झाँकना होगा।"


रामानंद के ये शब्द कबीर के जीवन का मंत्र बन गए। वे इस सत्य की खोज में निकल पड़े कि "मैं कौन हूँ?" उन्होंने अपने जीवन में कई साधकों, संतों, विद्वानों से मुलाकात की। पर कहीं न कहीं यह प्रश्न उनका पीछा नहीं छोड़ रहा था।


उनके सामने आज वही सवाल था—"अरे तुम?" यह आवाज न तो किसी इंसान की थी और न किसी ज्ञात स्रोत की। यह मानो उनकी आत्मा की आवाज थी, जो उन्हें उनके अस्तित्व का रहस्य समझाना चाहती थी। यह सवाल न केवल उन्हें, बल्कि हर इंसान को आत्म-चिंतन के लिए प्रेरित करता है।


कबीर को समझ में आया कि यह सवाल केवल उनके लिए नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए है। आज भी लोग बाहरी आडंबरों में फंसे हुए हैं। मंदिरों, मस्जिदों, गुरुद्वारों, चर्चों में ईश्वर को खोज रहे हैं, पर क्या वे सच में जानते हैं कि वे कौन हैं? उनके भीतर कौन बैठा है?


कबीर को एहसास हुआ कि उनकी कविताओं में जो संदेश है, वह इस "अरे तुम" के सवाल का ही उत्तर है। उन्होंने अपनी कविताओं में कहा है कि ईश्वर केवल बाहर नहीं, बल्कि हर जीव के भीतर है। हर श्वास में, हर पल में।


वे अपने आप से कहते हैं, "कबीर, तुम्हारी साधना का अर्थ यही था। तुमने अपने जीवन में सच्चाई को खोजने का प्रयत्न किया। लेकिन सच्चाई बाहर नहीं, भीतर है।" उन्होंने महसूस किया कि इंसान का असली रूप उसकी आत्मा है, जो न जन्म लेती है और न मरती है। यह आत्मा अनंत है, और यह वही "अरे तुम" है जिसे वे सदा से खोज रहे थे।


उन्होंने अपनी आंखें बंद कीं और उस सवाल का उत्तर देने की कोशिश की। "मैं हूँ," उन्होंने धीरे से कहा, "मैं वही हूँ जो हर प्राणी में है। मैं वही हूँ जो न जाति में बंधा है, न धर्म में। मैं वही हूँ जो अनंत है, असीम है।"


इस उत्तर के साथ कबीर को एक अद्भुत शांति का अनुभव हुआ। वे जानते थे कि यह उत्तर केवल उनके लिए नहीं था, बल्कि हर उस व्यक्ति के लिए था जो सत्य की खोज में निकला है। वे जानते थे कि उनके जीवन का उद्देश्य इसी उत्तर को समाज तक पहुँचाना है। उन्होंने अपने जीवन में जो कुछ भी सीखा था, वह इस एक वाक्य में समा गया—"अरे तुम।"


कबीर ने नदी के किनारे से उठकर चारों ओर देखा। प्रकृति भी मानो उनके इस जागरण का उत्सव मना रही थी। पेड़-पौधे, हवा, पानी—सबमें जीवन की एक नई लहर दौड़ रही थी। उन्होंने एक लंबी साँस ली और मुस्कुराए। आज उन्होंने अपने जीवन के सबसे बड़े प्रश्न का उत्तर पा लिया था।


उनके भीतर एक नई ऊर्जा का संचार हो गया था। वे जानते थे कि यह उत्तर केवल उनके लिए नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए है। वे अपने जीवन की उस साधना के अंतिम पड़ाव पर पहुँच चुके थे, जहाँ उन्हें वह ज्ञान प्राप्त हुआ था जिसकी तलाश में वे इतने वर्षों से थे।


उन्होंने एक आखिरी बार नदी की ओर देखा और खुद से कहा, "कबीर, तुमने अपने आप को पा लिया है। यह जीवन अब समाज के कल्याण के लिए है। अब तुम्हें इस ज्ञान को दुनिया तक पहुँचाना है।"


कबीर उस सुबह नदी के किनारे से वापस लौटे, लेकिन अब वे पहले जैसे कबीर नहीं थे। वे अब एक नई जागरूकता, एक नई समझ के साथ जी रहे थे। उनके भीतर का संतोष उनकी आंखों में झलकने लगा था। वे अब जानते थे कि उनके जीवन का असली उद्देश्य क्या था।



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इस तरह "अरे तुम" का सवाल केवल कबीर के लिए नहीं था, बल्कि हर उस व्यक्ति के लिए था जो अपने अस्तित्व के रहस्य को समझना चाहता है। कबीर ने अपने जीवन की यात्रा में जो कुछ भी पाया, वह यह था कि इंसान का असली रूप उसकी आत्मा में है, और वह आत्मा हर प्राणी में समाई हुई है। कबीर का यह संदेश आज भी हमें प्रेरणा देता है कि ईश्वर और सत्य को पाने के लिए हमें अपने भीतर झाँकना होगा।


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