नदी का किनारा और अधूरापन
गोरखपुर का मौसम उन दिनों कुछ अजीब सा था। शहर की गलियाँ हल्की धुंध में लिपटी हुई थीं, जैसे किसी राज़ को अपने भीतर छुपाए हुए हों। कॉलेज की पढ़ाई खत्म हो चुकी थी, और शिवा ने हाल ही में एक टेलीकॉम कंपनी में अपनी नौकरी शुरू की थी। वह अब एक नई जिम्मेदारी के साथ, अपने करियर में आगे बढ़ रही थी।
अभि, जो अब भी अपनी दिशा तलाश रहा था, अक्सर शिवा से मिलता था। उनके बीच की दोस्ती पहले जैसी थी, लेकिन शिवा के दिल में अब दोस्ती से कुछ अधिक महसूस हो रहा था। कॉलेज के दिनों में दोनों एक-दूसरे के करीब आए थे, लेकिन शिवा ने कभी अपने दिल की बात अभि से नहीं कही थी। अब, जब ज़िंदगी ने उन्हें नए रास्तों पर डाल दिया था, शिवा के दिल में एक बेचैनी सी घर कर गई थी। वह अभि के बिना अपनी ज़िंदगी की कल्पना नहीं कर पा रही थी।
एक दिन, जब शिवा और अभि गोरखपुर के राप्ती नदी के किनारे बैठे थे, शिवा ने अंततः अपने दिल की बात कहने का फैसला किया। शाम का समय था, सूरज की लालिमा पानी में झलक रही थी, और चारों तरफ एक अजीब सी शांति थी। शिवा ने धीमे से अभि का हाथ थामा और उसकी आँखों में देखा।
"अभि," उसने कहा...
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