चुप सा प्यार2

 सुबह सुबह आज फिर अजय बिना टिफिन लिए निकल गया। शिवा हाथ में बनाया हुआ तैयार किया टिफिन ले कर खड़ी अजय को जाते देखती रही। बच्चा न होने की वजह से रोज होने वाला ये झगड़ा अब रूटीन बन गया था। 

पास रखे कुर्सी पर बैठते हुए ,शिवा पुरानी यादों में खो गई।

"क्या हुआ,तेरा फिर आज अभि से झगड़ा हुआ क्या"

शिवा की बेस्ट फ्रेंड शिवानी ने उस से कहा,तो शिवा ख्यालों से बाहर आती हुई बोली," तुझे क्यूं लगता है कि जब तब मैं अभि से लड़ती रहती हूं?"

"तेरी शकल पे १२ बज जाते हैं जब तेरे और अभि के बीच कुछ ठीक नहीं चलता।"

"अरे यार कल रात पापा बोल रहे थे BA कर लिया है अब पढ़ाई बंद। मैने सुबह अभि को *फोन* किया था, तो साहब किसी को स्टेशन छोड़ने गए थे,मैंने उसकी बहन से कहा बोलना बात कर लेगा।( इस टाइम पे mobile की सुविधा नहीं थी)।"

"लाट साहब एक घंटे बाद आए, तो मैं टेलीफोन के पास से दूर थी "

"अरे बाप री,फिर कहीं पापा ने तो..."

"हां यार, दो बार"

"कुछ बोला क्या?"

"ना यार मैं उसे पागल बोलती हूं,पर वो है थोड़ी ना" वो मुस्कुराई।

फिर पांच मिनट रुक कर उसने मिलाया,तो मैंने तेरा नाम ले के बात की"

"तो बात हो गई न ,फिर झगड़ा कैसा?"

"अरे जी पागल है न ,मैं कह रही की अब मैं पढ़ नही पाऊंगी,और वो बोल रहा था कि आज पीले रंग का सूट पहन के आना।"

"है ना पूरा पागल"

"अच्छा ,और तू ठीक है?"

"क्यों मुझे क्या हुआ?"

"क्या पहन के आई है?"

"सूट,और क्या?" शिवा झल्ला कर बोली।

"किस रंग का?"

शिवा ने एक नजर नीचे देखते हुए धीरे से कहा"पीला"

"ये लड़का मुझे भी पागल कर देगा?" वो थोड़ा शरमा सी गई थी।

"तू पूरी पागल है,आज व्रहिस्पति वार है,तुम आज अभि के साथ मंदिर जाती हो,और वो सिर्फ यही याद दिला रहा था।"

सामने से अभि की लाल गाड़ी आते देख ,शिवा भी गाड़ी के रंग में रंग गई थी।

दूध वाले की दरवाजे पर बजने वाली घंटी ने शिवा को वापस अपनी दुनिया में ला खड़ा किया था।

हम वक्त रहते लोगों की कीमत नही समझ पाते हैं,ये सोचते हुए शिवा तेजी से दरवाजे की ओर बढ़ी थी।





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