वो मिलना आखिरी था क्या???

 खामोश दोनों के साथ बैठी थी,

अभि और शिवा शायद आखिरी मुलाकात में बैठे थे। शिवा कुछ कहने के लिए होंठ कंपकपाती,पर कुछ भी कह पाने की हिम्मत जुटान को जाने को जैसे होंठ दम तोड़ बैठ जाते। सांस भी आज तेज दौड़ के जीवन भर की दौड़ पूरी कर लेना चाहती थी जैसे। अभि कानों में दौड़ती तेज सन्नाटे के शोर से परेशान था। बहुत बोलने वाली उसकी जुबां भी आज सन्नाटे को तोड़ने की कोशिश से पहले ही दम तोड़ देती। मौत सी ठंड जैसे जुबां को बर्फ की तरह जमा दे रही थी।

कब्रिस्तान सी खामोशी तोड़ते हुए शिवा सिर्फ इतना ही कह पाई,

"क्या ये हमारी आख़री मुलाकात है? अब क्या हम फिर कभी यूं वक्त दे पाएंगे?"

आंसूओं के सैलाब ने फिर खामोशी का दामन फैला दिया था

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