आंसू और हम
"शायद मुझे बाहर जाना पड़ेगा,अभि" शिवा ने उदासी की चादर ओढ़ कर कहा।
"ओह, तो मतलब अब तुम्हें देख नहीं पाऊंगा।"
अभि ने कहा।
शिवा ने अभि की आंखों में देखा।
आंखों और होठों में क्या दुश्मनी है,जब आंख को सिर्फ और सिर्फ देखने की इज़ाजत है तो उसे बोल कर दिल के एहसास बयानी की इज़ाजत कौन देता है।
मुहब्बत मे आंख हर अदा से साथ देती है।
शिवा सोचती है और आंख फिर...
शिवा के शहर छोड़ने में अभी वक्त था, फिर भी अभि की धड़कनें जैसे इस एहसास को थम कर थाम लेना चाहती थी।
पर वो जानती थी कि थम जाने से वक्त की डोर कहां थमा करती हैं।
वक्त धड़कनों का लिहाज नहीं अता करते वो तो बस समंदर की तरह अनंत दिखने की ख्वाहिश से बहते जाते हैं, ना धीमे न तेज बस अपनी ही रो मे," अभि सोच ही रहा था कि आंख फिर चुगली की आदत से मजबूर बह चुकी थी।
शिवा अभि की चुप से वाकिफ हो रही थी।
अजब है ये आंसुओं का संसार, आंसू कहां gender देखते हैं, लड़कों को रोना नहीं है,ये बात कभी अभि को समझ नहीं आई थी। वो तो जब तब इन आंसुओं को बहाता रहता था।
जब लोग ये कहते हैं लड़के नहीं रोते हैं,तो ये बात आंसुओं को सुनाई नही जाती क्या? वो तो बस बह जाते हैं..
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