पहली मुलाकात वो भी ससुराल में
छत पर खड़ी शिवा गणेश मूर्ति विसर्जन की भीड़ को देख रही थी। ससुराल में आज उसे 8 महीने हो चुके थे।
आज उसका मन सुबह से कुछ बेचैन था, पता नही क्यों किसी अपने की बहुत याद आ रही थी। अचानक वो भीड़ में एक चेहरा देख कर मचल उठी। ये वो ही है या उसकी आंख धोखा दे रही थी।
तेजी से एक बाइक आ कर गेट पर खड़ी हो गई और ये कोई धोखा नहीं था,ये तो, ये तो वही है। शिवा सोच कर सिहर गई। क्यूं आया है ये यहां? क्या बोलेगा? जाने कितने सवाल उसके मन के झील में गोते खाने लगे।
गेट पर वो पापा जी से कुछ बात कर रहा था,पापा जी लॉन में मिट्टी खोद रहे थे, उसी मिट्टी वाले हाथ से उस से कुछ कह कर हंसने लगे।अब वो अंदर आ गया था। धड़कने उसकी तेज हो गई थी, वो तेजी से नीचे की ओर भागी। भागते हुए उसने एक नजर शीशे पे डाली, बालों को ठीक किया। बाहर आते हुए सासु मां ने कहा" शिवा ,ये चाय बाहर ले जाओ।" पापा जी को देने के लिए।
शिवा को तो मानो मन की मुराद मिल गई। पर एक मन डर भी रहा था,क्या बोला होगा उसने" आप मुझसे दोस्ती करोगे।" जो उसने पहली मुलाकात पर मुझसे कहा था।
मन भी न उलझ सा जाता है कभी कभी।किसी खास को देख कर खुश हो तो जाता है पर परिस्थिति कहां मन के साथ खड़ी हुई है, वो उस खुशी का कत्ल कर देना चाहती है,गला घोंट देना चाहती है। शिवा हाथ में चाय की ट्रे ले कर एक कदम आगे बढ़ा रही थी। जहां मन तेजी से उस चहरे से रू ब रू होना चाहता था वही दिल किसी बुरे की आशंका से तेज धड़क रहा था।"क्या कहा होगा उसने? क्या उसने अपना परिचय दोस्त बताया होगा।"
बाहर निकलते वक्त पापा की जोर वाली हंसी उसे राहत दे रही थी।
पर....
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