आखिरी ख्वाहिश १
Telephone की घंटी बज रही थी, शिवा तेज धड़कते दिल के साथ फोन उठा लेती है, वो जानती थी अभि की जिद्द।
उधर से उसकी ही आवाज थी।
"जल्दी छत पे आओ, मुझे जाने से पहले एक आखिरी बार तुम्हें देखना है, फिर मैं कुछ नहीं मांगूंगा तुमसे।"
वो जानता था, अब मांगने से भी कुछ पूरा नहीं होने वाला था।
शिवा मना करना ही चाहती थी, पर उसका चाहा हुआ पूरा ही कब हुआ?
पीछे से भैया की आवाज आई "कौन है शिवू"
"कोई नहीं wrong number भाई"
शिवा फोन रखते ही छत की ओर भागी, वो जानती थी अभि जरूर आएगा।
छत के कोने से अभि को साइकिल पर चैन चढ़ाते हुए देखा।
कॉलेज के दिनों में भी वह यही तो करता था,जब वो अपनी बेस्ट फ्रेंड शालू के साथ रिक्शे पर जाती थी।
छत के कोने से अभि तक नजर जाने पहुंच रही थी या नहीं पता नहीं, पर उसकी आंख की नमी का अहसास जाने कैसे उसकी आंख में चुभ रहा था। प्यार का शायद यही दर्द बांटने वाला पहलू उसे दुनिया के बाकी रिश्तों में ऊपर सबसे कर देता है।
ये आखिरी बार वो एक दूसरे को देख रहे थे, ये दोनों जानते थे।
"काश अभि रुक कर मिलने की जिद्द करता, उसकी जिद्द को शिवा जरूर पूरा करती थी, लाख बंदिशों, तीन भाइयों और एक जीजा के पहरेदारी के बाद भी,
चाहे वो यूनिवर्सिटी पार्क में मिलना हो, या सिनेमा हाल में जॉन अब्राहम कि फिल्म देखने के लिए छुप के रिक्शा , ऑटो से सहेली के घर जा कर वहा से अभि की लाल Kinetic zing पर बैठ कर जाना।
क्या क्या नहीं किया था अभि की जिद्द के आगे ।"
"आज अभि क्यों समझदारी का व्यवहार कर रहा था? उसने सिर्फ एक कसम ही तो दी थी। क्या कसम कोई ताला है, जो मन और दिल की बदमाशियों को बांध देता है, इतना मजबूत।
क्यों?"
"सुना है कसम तोड़ने से इंसान मर जाता है, तो ये जिंदगी किस काम की जब हम साथ ना हो।" सोचते सोचते शिवा खूब टूट के रोना चाहती थी।पर शायद आंसुओं को भी अब वो खर्च नहीं करना चाहती थी। ये आंसू ही तो उसके रिश्तों की गवाही दे रहे थे।
" काश वो जाते जाते रुक जाता और एक आखिरी जिद्द में उसे गले लगाने को कहता। ये जिद्द तो मैं पूरी कर सकती थी, थोड़ी मुश्किल से सही।"
" काश मुहब्बत में लोग मन की बात सुन सकते।" शिवा ने भरे मन से सोचा।
" काश शिवा ने कसम ना दी होती अपनी, तो मैं एक आखिरी बार मिलने को कहता। मिल के काश वो गले लग जाती, एक आखिरी बार।"
इतने काश के बीच फसा अभि निकल पाता तो उसे मालूम होता शिवा भी तो यही सोच रही थी।
हम कुछ अनकहा कह नहीं पाते और अनकहा नासूर बन के जीवन भर चुभता रहता है।
कह देना या नहीं कहना " में फंसा मुहब्बत दार इंसान फिर जिंदगी भर काश से निकल ही नहीं पाता। क्यू आखिर।
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