रंग प्यार के २

 सासें शिवा की सौ की रफ्तार पकड़ रही थी, जो कहने का निश्चय किया था उसने , वो कहना आज तीन साल में पहली बार जरूरी लगा था उसे।

संगीता की बातों का असर था या कहीं खुद ही दिल के हाथों मजबूर हो गई थी, कह पाना मुश्किल सा हो रहा है।

"इतने सालों का रिश्ता कहीं नये रिश्ते की आहट से रूठ ना जाए,

साथ बढ़ने की जगह साथी मेरा कहीं छूट ही ना जाए" के ख्याल से डर भरी घबराहट ज्यादा थी ।

या रिश्ते में ऩई ख़ुश्बू के गमकने के ख्याल से मुहब्बत की सरसराहट से शरीर कंपकपाते हुए अभि की राह तकती शिवा आज चेहरे की लालिमा संभाल नहीं पा रही थी ।

सामने से लाल गाड़ी पे आता "अभि" भी तो चेहरे के लाल रंग से कन्फ्यूज ही हो रहा था।

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