सांस और याद १

 सांसों के दरमयां यादों के कुछ राग बसते हैं,

कुछ गैरों जैसे अपने, कुछ अपने जैसे गैर के,

कुछ मिठी कुछ खट्टी, कुछ पक्की कुछ कच्ची,

कुछ स्वाद कुछ बेस्वाद, यादें कुछ झूठी कुछ सच्ची।

यादों के दरमयां भी कुछ चेहरे हैं पहचाने से,

कुछ अपने कुछ अपनों से बेगानों के।

याद जो सांसों में घुल सी जाती है,

कुछ अहसास मीठे कड़वे से सांसों में घोल जाती है ।

सांसे यादों का गहरा समंदर भी बन जाती है,

मन की दीवार पर कभी तेज सुनामी सी टकराती है,

कभी हौले से ज्वार भाटा सी यादें ,

सांसों में ईठलाती हैं।

जितना यादों के समंदर में यूं दिल डूब सा जाता है,

यादें

आंखों से समुदर की लहरों को मचलाती हैं,

कभी गम तो कभी खुशी की चेहरों पर मुस्कान बिछाती हैं।

पर कुछ भी हो जाए,

 मेरे दोस्त मेरे यार,

पर कुछ भी हो जाए मेरे दोस्त मेरे यार ,

जैसे ये यादें ही,

ये यादें ही तो हैं जो इंसान को जिंदा बनाती हैं,

ये यादें ही तो हैं जो इंसान को जिंदा बनाती हैं।


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