सांस और याद २
यादों के दायरे भी अजब गजब खेल रचाते हैं,
कहां सिकुड़ से जाते हैं, कहां फैल मचाते हैं,
यादों के दायरे भी अजब गजब खेल रचाते हैं,
जहां हो खुशियों के आसमां वहां कुछ सकुचे से,
शरमाते हैं,
जहां हो गम का समुंदर वहां फैल से जाते हैं ।
यादों के दायरे भी अजब गजब खेल रचाते हैं,
कहां सिकुड़ जाते हैं कहां फैल मचाते हैं ।
खुशी चेहर पे चमकती हैं यूं डर डर के,
नजर लग ना जाए, इसी से बचाते हैं।
आंखों से आंसू बन ये छलक जाते हैं,
यादों के दायरे भी अजब गजब खेल रचाते हैं ।
गम के समंदर को लहरों में बहाते हैं,
जब तक गुजरे ना कड़वी यादों का कारवां,
तूफानों को दिल से आंखों तक पहुचाते हैं,
यादों के दायरे भी अजब गजब खेल रचाते हैं।
यादों के दायरे भी अजब गजब खेल रचाते हैं,
कहां सिकुड़ जाते हैं कहां फैल मचाते हैं ।
रोज ही बहती है ये यादें ,
गलियों से चौकसों से,
कभी आखों से ऩमक बन के,
कभी चेहरे पर दमक बन के,
कभी सांसों के उठापटक से,
कभी धौंकनी चमक के,
चलती है रोज सांसे, यादों के सहारे ही,
ठहरता है यहां सब कुछ शीत गरम बन के।
निकल जाए जो ये यादें,
होठों पे रहम बरपे,
पर कहां कोई जिंदा है,
बिन इसके दायरों के,
पर कहां कोई जिंदा है,
बिन इसके दायरों के,
यादों के दायरे भी अजब गजब खेल रचाते हैं,
कहां सिकुड़ जाते हैं कहां फैल मचाते हैं ।
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