जवाब१
कुछ सवाल आसान से होते हैं,
पर जवाब उसके आसमान से होते हैं ।
सवाल मन का हाल बता ही देते हैं,
हो ंमन में जो दर्द जता ही देते हैं ।
ईक छोटा सा था सवाल दिए का हो जाता है बड़ा,
कहां कितना रखे, जो घर हो हरा भरा,
हो हरा भरा घर ऱौशन करने को तो तेल कितना हो?
ये सवाल मन में उठा, तो जवाब की तलब जगी..
सोचा सारा गणित लगाया,
उलट पुलट दी मन की काया,
जवाब ना फिर भी ठीक सा आया।
तो मैने दिया , दिए की दुकान पर मन की उतार,
पूछ डाला गरीब से भारी मन का ये सवाल,
यकीन मानो मेरे यार,
दिया उस गरीब ने अपने मन की उतार,
मैं सोचता था,
एक लीटर से बीस दिए या पचास,
दूसरे लीटर की भी क्या दियों को होगी तलाश ।
उसने कहा "आधा लीटर बहुत होगा जलाने को पचास।"
फिर मन की गुत्थी थी जैसे सुलझ गई,
जिसके सुलझने की उम्मीद ना थी खास।
गरीब के मन से जो उलझी हर गुत्थी,
कैसे यूं सुलझ गई,
मन के भरोसों को जैसे कई हल दे गई।
जब ज्यादा हो रास्ते, तो मन में भरम पलता है,
किस पे चलूं पहले इस बात से फिसलता है।
हो जितना तुम्हारे पास,
वो कम पड़ सकता है।
पर सीमाओं के अंदर इंसान बहुत संभलता है।
हो जितना तुम्हारे पास,
वो कम पड़ सकता है।
पर सीमाओं के अंदर इंसान बहुत संभलता है।
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