पतंग नारी या मांझा १

 औरत की जिंदगी पतंग होना चाहती थी,

पर समाज उसे मांझा बनाना चाहता था ।

वो मांझा, जो पतंग और पुरूष के बीच की कड़ी होता है,

तो समाज की जीत होती है,

मांझा,

जो पतंग को उड़ने की खुशी देता है,

मांझा,

जो पतंग को आसमान छूने का अवसर देता है,

मांझा,

जो पतंग की रक्षा के लिए सदैव अपनी ही मांझा मंडली से उलझ पड़ता है,

कभी कभी टूट भी जाता है,

जो पुरूष पतंग को मांझे की मदद से ही बचा लेता है,

वो कभी मांझे को सम्मान या प्यार नहीं देता,

बल्कि  कभी खुद पर तो कभी पतंग पर गर्व घमंड का ताज पहनाता है।

औरत भी मांझा बन के पूरा जीवन बिता देती है,

जब कभी समाज रूपी पतंग कटती है तो सारा इल्जाम नारी रूपी मांझे को थमा दिया जाता है,

क्यूं पतंग रूपी समाज के ऊंचाईयों के लिए नारी को साधुवाद देने से कतरा जाते हैं ?


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