जीत होती है सदा ही, मर्यादा और राम की।
राम रावण दास्तां कहती है देखो दश हरा,
कुछ करो ऐसा की जीवन भी हो जाए ,फिर हरा।
था जो रावण युद्ध हारा,
जीत राम की थी कहां?
वानरों ने लंका खोजी,
पार दरिया को किया,
राम थे आंसू बहाते, वध जो बाली का किया।
राम बैठे पूजते शिव,
वानरों ने पूल रचा।
था जो रावण युद्ध हारा,
जीत राम की थी कहां?
थे पड़े लखमन अचेते मृत्यु को छूने चले,
राम बैठे अस्रुपूरित क्रोध खुद पर ही किया।
वानर ने सुसेन संजीवनी का था खोजा रास्ता।
विभीषन के छल ने खोला भेद रावन का भरा,
राम ने था तीर मारा ,
था वो रावण तब मरा।
था जो रावण युद्ध हारा,
जीत राम की थी कहां?
जीत राम की ही रही , ये वीर गाथा सब कहें।
राम ही की जीत थी वो,
राम उस हर क्षण में थे,
राम उस कण कण में थे।
वानर हो, या हो विभीषन,
राम सबके मन में थे।
जीत छल से जीत बल से,
होती गर रावण पे तो,
जीत जाते देव दानव,
जीत जाते ब्रह्मा शिव ही।
जीत जाते सब वहां,
पर कहां ताकत थी जरूरत,
होती है हर जीत में?
राम रावण युद्ध में तो,
जीत मर्यादा की थी।
राम , वानर ,मात सीता,
से विभीषन की सदा, सब जगह नैतिक वहां।
वो युद्ध था मन से लड़ा।
चाहे कितनी राह दुर्गम,
हो कठिन मरजाद(मर्यादा) की,
जीत होती है सदा ही,
मर्यादा और राम की।
जीत होती है सदा ही,
मर्यादा और राम की।
सुंदरभावाभिव्यंजना ...हृदयस्पर्शी सृजन
ReplyDelete**अश्रुपूरित .... होना चाहिये संभवतः
ReplyDeleteजी, पर अभिव्यक्त करने में लय इस स" में थी। तो
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