जीवित कमरे, किराए के १

 2015 की अक्टूबर की शाम को ईक किराये पर लिया हुआ कमरा,जो पिछले पांच सालों से मेरा साथ दे रहा था।

आज इसे खाली करना है।

कमरा ही तो है ,ईंट सींमेंट से बना हुआ , खाली कर देंगे!!

आसां है, रखा ही क्या है?

स्याही से रंगी कॉपी,मारकर से रंगी किताबें ,

देर रात सोयाबीन की तहरी तो कभी अरहर की दाल की खिचड़ी बनाने वाला कूकर,

चाय का गिलास, थाली, चम्मच और

बरतन, ईक आठ साल पुरानी फोल्डिंग चारपाई, सात साल पुरानी कुर्सी, चार साल पुराना कूलर और ... और...

यादें ।।।

कौन कहता है कमरे निर्जीव होते हैं |

 आज एक कमरे को खाली करते हुए महसूस हो रहा है,

जैसे मैंने समुंदर को आजाद कर दिया है| 

 इसका सैलाब मुझे बहा कर दूर यादों की दुनिया में ले जाना चाहता है पर मुझे डर है.... 

#diary2007-2015

यादों के हाथ खून से सने ना हो ।

खून , जी हां ,खून मेरे ख्वाबों का ।

ख्वाब, जिनके हर लम्हे में मेरी मुहब्बत शामिल थी, मुहब्बत कुछ कर गुजरने की , कोई मंजिल पाने की।

ख्वाब, जिन्हे मेरे पिता ने बुना था मेरी आंखों में।

पर लगता है आज मेरे ख्वाबों पर मां की तबियत भारी पड़ रही है। मां की देखभाल या ख्वाब । 

एक को चुनना होगा।

मैने मां को चुना है। मां कहती है मेरे साथ मेरे पास भी ये ख्वाब पूरा कर सकते हो । 

कमरा खाली हो रहा है, यांदें हर कोनो से टपक रही है।

ये यादें मुश्किल से भरे जख्मो के मुंह खून ना लगा दें।

....... शेष

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