बिन तेरे नवरातें

 किसी ने कहा है,

आज नवरात्र शुरू है,

जय मां का नारा भी दिया।

पर क्या हम ये जयकारा लगाएंगे?

क्या हम नवरात्र मना पाएंगे?

पूछा जो दिल से सिर्फ सन्नाटों मे जवाब आया।

जहां मां जी रही वृद्धास्रम में वहां कैसे जय मां हो पाया।

सुनसान सड़क से भीड़ भरी गलियों में,

क्या है कोई सुरक्षित माया?

पूछा जो दिल से सिर्फ सन्नाटों मे जवाब आया।

सड़क गलियों की क्या बात करूं,

पेट में भी सुरक्षा से केवल भरम ही है आया।

क्या हम नवरात्र नवदुर्गा से मना पाएंगे?

पूछा जो दिल से सिर्फ सन्नाटों मे जवाब आया।

मैं नहीं मांगता भीख पुरूष से,

मैं नहीं मांगता भीख पुरूष से,

दुर्गा ,पार्वती ही नहीं काली की भी नारी में छाया।

बढ़ आगे और मर्दन कर ,

कब तक आस पकड़ के खड़ी रहेगी,

सब रचा है तूने,

चाहे मन की सुन्दरता हो,

या बल हो पुरूष का,

रची है उसकी भी  काया।

नहींं है चाहिए कुछ भी तुझको,

सब है तूने रचवाया ।

नवदुर्गा की शक्ति तुम हो,

कौन है तुझको छू पाया।

तुझ बिन क्या हम मना पाएंगे,

नवरातों की ये पावा।

पूछा जो दिल से ही मैने,

 सिर्फ सन्नाटों मे ही जवाब आया।

Comments

Popular Posts