कब तक दूसरों के भरोसे रहोगी नारी

 कब तक दूसरों के भरोसे रहोगी??

कब तक??

बताओ।

कब तक न्याय मांगोगी?

कब तक?

न्याय?? कैसा न्याय??

कब हुआ है न्याय तुम्हारे साथ??

कब मिला तुम्हे जो मिलना था??

ये जो हाल तुम्हारा है ना,

वो इसी भरोसे से है।

भरोसा जो तुम जताती रही हो इस समाज पर,

भरोसा साथ दिखने वाले लोगों पर,

कब तक इंतजार में रहोगी?

कोई कान्हा, कोई हुमायूं,

कोई महात्मा आएगा।

कान्हा ने राधा के साथ क्या न्याय किया था?

हुमायूं शेरशाह से हारा था,

महात्मा भी कहां महात्मा रह पाए बिना कस्तूरबा के ।

तुम पार्वती ही नहीं हो,

शिवा की,

काली भी हो,

जिसके कदमों में शिव हैं।

तो आगे आओ,

मैं औरों की तरह तुम्हारे लिए न्याय की भीख नहीं मांगूगा।

भीख में दुसरों का हक होता है,

ये अधिकार तुम्हे खुद लेना है कि तुम अपने बल पर दुनिया की ऩई इबारत लिखो।

तुम्हारी लिखी इबारतों ने ही इतिहास रचे हैं,

गार्गी कभी, रजिया कभी तो लक्ष्मी बाई कभी,

हर बार तुम्हे इस समाज ने घुटनों पर टेका है।

आगे बढ़ के न्याय छीन के लेना होगा, 

समाज की स्रर्जक को विध्वंस के लिए भी तैयार होना होगा।

सड़कों पर आओ नारी,

अभी नहीं तो कभी नहीं ।

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