आंखे, पलकें और ख्वाब का रिश्ता
ख्वाबों के दायरे आंखों के परे जिंदगी की इक नई तस्वीर बनाते हैं
जिंदगी के पन्नों पर सच की स्याही में कुछ मिलावट हो जाती है,
जहां हम जिंदगी भर सच के होने ना होने से बेजार होते हैं।
ये कमाल आंख, पलक और ख्वाबों की तिकड़ करती है ।
कैसे??
आंखें भी कितनी अजीब होती हैं, कोई सामने ना हो तो उसे देखने के लिए बेसब्री की हदें पार कर देती हैं। उस लम्हे तोपलक झपकाना भी ना काबिले माफी गुनाह मालूम होता है ।
पर पलकों का कब आंखों की बेसब्री घटाने या इंतजार में साथ देने का इरादा रहा,इनकी शरारतें भी कहां कम होती है,
जैसे ये इसी लम्हे में जीना चाहती हैं,
तभी तो झपकना बढ़ा देती हैं , जब आंखें इंतजार करती हुई एकटक होती हैं, कभी कभी तो ये बोझिल हो नींद के आगोश में ढ़केलती हैं ।पर आंखें भी अपनी मंजिल की तलाश कर, कहां कम रहती हैं,पहुंच ही जाती बंद होती आंखें ख्वाबों की खिड़कियों पर वहीं से उनका दीदार कर ही लेती हैं।
हां ख्वाबों की खिड़कियां जो सच ना हो सके , उसे भी सच बना देती हैं ना। अजीब होती हैं ना।
काश जिंदगी ख्वाब हो जाती!
मैं और तुम उसमें कभी अलग ना होते।
कोई भी ना होता हमारे रिश्तों के दरमयां,
ना ये दुनिया, नाते ,लोग,
ना समय की भागती घड़ियां,
ना ही.....
सोचते सोचते शिवा थम गई।
ख्वाब देखने से ज्यादा उसके टूट कर बिखरने का डर अकसर नींद भरी आंखों की जिंदगी बेजार (दुःखी) कर देते हैं।
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