मिर्ची और पापा

 "भईया, और कुछ"उसने पूछा।

" हां, २५० ग्राम मिर्ची"

"क्या, भईया" उसने जोर दिया, फिर बोला," वो टमाटर के साथ दे दिए हैं"

"नहींं यार और एक पाव तौल दो"

वो आश्चर्य से मिर्ची तौलने लगा।

हां, क्यूं ना हो आश्चर्य, मैं कभी मुफ्त की मिर्ची से अलग मिर्ची लेता नहीं था।

आज पापा की याद आ रही है।

"अरे खाना लाओ जी।"

"ला रही हूं।" मां तेजी से खाना निकालती ले आती। वापस किचन में पहुच ही रही होती कि आवाज आती

"अरे हरी मिर्च ले आओ।" मां फिर तेजी से फ्रिज से मिर्ची निकाल कर धुल के देती ।

वो जब भी खाना खा रहे होते तो मां से मिर्ची जरूर मांगते। मुझे लगता की खाना तीखा नहीं होगा।

पर मैने ध्यान दिया कि खाना कितना भी तीखा बना हो पापा मिर्ची जरूर मांगते। पकौड़ी में भी मिर्ची की पकौड़ी खाते।

मुझे समझ नहीं आता, मैं बहुत छोटा था।जैसे जैसे मैं बड़ा हुआ ये पहेली सी हो गई । फिर एक दिन हमारे घर टी वी आई । तब दूरदर्शन चैनल के नाम पर इकलौता शेर होता।

धीरे टी वी का संसार बढ़ने लगा, टी वी सीरियल्स की दुनिया से परिचय हुआ तो इस पहेली की इक कड़ी खुल गई ।जैकपाट फिलिंग आई 

"खाना कैसा बना है?"

सीरियल्स में पत्नी पूछती।पति कुछ ना कुछ कमी निकालता।

या बुझे मन से तारीफ करता। बस समझ आया कि पापा मिर्ची मांग के मां को जताते की खाने की तारीफ की उम्मीद ना करना। पहेली सुलझी पर अब मुझे गुस्सा आया।

बस फिर तो मुझे जब भी मिर्ची देने जाना होता तो बड़ी वाली मिर्ची ले जाता या मोटी वाली।

"हां भईया हो गया। १२० रूपए हुए"

सब्जीवाले की आवाज से मैं वापस आज मे लौटा।आज जब दुनिया की भाग-दौड़ में संसार में जहर बुझे लोगों की बातें सुनता हों पता चलता है कि लोग,उनकी बातें इतनी तीखी होती हैं कि जिंदगी में और कुछ भी तीखा नहीं लगता।स्वाद जो खाने का होता है मन के तीखेपन से टक्कर नहीं ले पाता, तीखापन जैसे दम तोड़ जाता है इस जहां के जहर से लड़कर।

आजकल मैं भी मिर्ची ज्यादा खाने लगा तो पिता का दर्द सीने में उतर आया ,कितना कुछ एक पिता सहता है परिवार चलाने की खातिर ही तो।फिर उस तीखेपन से बच्चों को बचाना ही चाहता।काश हम समझ पाते। सॉरी पापा

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