दर्द की दास्तां १

किसी ने पूछा,
ये क्या लिखते हो,
मुझे तो समझ ना आता है।
दुख दर्द का जो जिक्र होता है यहां,
वो मेरी इन आखों के से परे रह जाता है।
कुछ देर थमा मैं,
फिर कोशिश की नाकाम,
दुःख या दर्द कहता अब थका मैं,
समझाना तो ना था किसी औऱ को,
पर छुपाने को भी ना था तैयार मैं।
तो कहा मैने,
सुनो ये जो दर्द की जो होती है दास्तां,
वो होती है आंसूओं की स्याही से बयां।
आंसू..
देखा है आंसूओं को,
ये रंगों को नहीं लेते हैं आजमां।
जी हां,
आसूओं की दुनिया कहां करती हैं रंगो को जमा।
रंगो की दुनिया से जुदा ही होती हैं,
आंसूओं की स्याही बनाती है जो समां।
तो गर हो चाहत पढ़ने की ये दर्द की कहानी,
तो जानों आंसूओं से सजी रंगहीन जुबां।
आंखों में होंगे जो आंसू के दर्द के,
 चीखती कहानी पढ़ना होगा आसां।
आंखों में होंगे जो आंसू के दर्द के,
 चीखती कहानी पढ़ना होगा आसां।

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