पलकें पढ़ी तो जाना

 मुझे बहुत पसंद है पढ़ना,

किताबें नहीं,

तेरी आंखों भी नहीं,

हां ये जो आॉखों के ठीक ऊपर रहने वाली,

पलकें, हां ये पलकें,

देखो ना, कितनी बाते कहती हैं,

कितना कहानियां छुपी हैं इनमें।

कभी कभी लब कुछ कह नहीं पाते,

पर ये पलकें तो छुपा नही पाती कुछ बातें, अनकही।

ना जाने क्यूं छूपाना इंन्हे आया ही नहीं ।

कभी जो होती तुम खुश तो देखा है, छुपा रहे होते हो,

तो ये पलके झपकती हैं बिना रूके,

फैलती जाती चेहरे के आसमां पर मोर की तरह।

कभी दुःख जो छू जाता है मन के समंदर की सतह पर,

पलकें जैसे भूल जाती अपना झपकना,

ठीठक कर ठहर जाती है जीवन ना बचा हो जैसे इनमें।

किसी का इंतजार होता है इंन्हे,

कोई , जो इन्हें जिंदगी से जोड़ दे।

जब तुम होते हो बेचैन , छुपाने की पूरी कोशिश करती हैं ये नाकाम।

हर अहसास को बता देती हैं।

जो होता है" अपना" जता देती हैं,

जो होता है" अपना" जता देती।

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