वो शब्द

 "अच्छा मैं जा रही हूं।"

"कुछ कहना नहीं है।"

"कहना है ना"

वो शरारत से मुस्कुराई

"तो बोलो"

अभि की धड़कनें उसे साफ सुनाई दे रही थी,

"हां हां मैं किसी से डरती हूं क्या"

तो बोलो

"सात बज रहे हैं, घर जाना है"

" हां तो जाना , बोल दो फिर"

पैर कांपने लगे थे अभि के।ऐसा क्यूं होता है?

कुछ शब्द सुनने के लिए कान के साथ पूरा जिस्म उसे सुनना चाहता है,

 या शायद महसूस करना चाहता है,

या शायद उन शब्दों में डूब जाना चाहता है।

वो शब्द बोलने वाले के लिए भी तो जिस्म की पूरी कायनात का मसला बन जाते हैं ।

क्यूं?

एक सन्नाटा सा पसर जाता है दो धड़कनो के दरमयां ।

आंखें अचानक से रूह को चीरने लगती हैं...

अभि वही महसूस कर रहा था।

"क्या है?" शिवा जोर से बोली।

"कुछ नहीं बस बोल के जाना"

अभि की सांसे बढ़ने लगी थी ये कहते कहते।

"ओफ्फो, चलो मैं जा रही हूं।"

"शिवा, बोल के जाओ" अभि लगभग झल्लाते हुए बोला।

शिवा की आंखें शरारत से नाचने लगी,

"बाय" वो बोल के अपने घर की गली में मुड़ी।

अभि अब संभल गया था, " I Lov U too"

"हे मैने ये कब कहा" शिवा पलटी।

"अच्छा मैने तो यही सुना।" अभि मुस्कुराया।

"तो नहीं करती"

"मैने ऐसा कहा क्या"

"तो करती हो"

जिस्म का हर भाग जैसे किसी बारिश के अहसास से सराबोर महसूस कर रहा था।

अभि सुकून से गाड़ी की आवाज में 

' लागी तुम से मन की लगन ' सुन रहा था। 

शिवा कदमों के नीचे सड़क की जगह बादलों को महसूस कर पा रही थी ।

कालर ट्यून पर "मेरे सपनों की रानी" सुनते जा रही थी ।

वो जानती थी अभि फोन नहीं उठाएगा।

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