मुहब्बत आसमानी रूहों की
मुहब्बत तो इस सारे आसमान में बिखरी पड़ी है,
कहां पूछते हो??
तो देखो जरी गौर से दिन रात की मुहब्बत,
प्यार देखना हो तो सूरज और चांद को देखो,
दिन भर उजाले बांटकर जब सूरज थक जाता है,
तब शाम का आंचल लिए चांद उसकी राह तक रहा होता है,
धीमें धीमें सूरज चांद की ओर बढ़ता है,
पीली तपन को कम करता है सूरज की कहीं,झुलस ना जाए चांद।
चांद के नारंगी आंचल को देख,
शरम से लाल होता हुआ,बस उसी में समा जाता है ।
चांद की चांदनी देखी है कभी,
सूरज ही चांद के पीछे आंचल में छुपा,
अपनी रोशनी से चांद को सराबोर कर,उसकी सुंदरता को नए आयाम देता है।
दिन में चांद जैसे आसमां के आंगन में छुप कर निहारता है।
कभी कभी चांद रात का इंतजार नहीं कर पाता और दिन में चुपचाप आकर सूरज को अपनी तीरछी छवि से शायद उसे रिझाता भी है।
देखो इनकी किस्मत में मीलों की दूरी जैसे मिलने का दिखावा तो करती है पर मिलन कहां होने देती है?
दोनों का एक दूसरे में खो जाना जमाने को जमता नहीं,
तभी तो ग्रहण का रंग देकर दुनिया को आसमान की पाक रूह को देखने से मना कर देते हैं,
समाज को इस पाक मोहब्बत से दूर कर देते हैं ।
कहां मिलता है ऐसा खामोश प्यार आसमानी रूहों के सिवा।
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