बंजारा बादल या जीवन इंसान का
बारिशों को देख कर ये सोचता हूं मैं,
जुदाई का गम बड़ा होता है,
या मिलन की खुशी,
जुदाई बादलों से,
बादलों का छोड़ साथ बारिश मिलने को जाती है,
सूखी धूप से बेहाल,जमीं से।
बारिशों को देख कर ये सोचता हूं मैं,
जुदाई का गम बड़ा होता है,
या मिलन की खुशी,
सुना है बारिशों का बनना समंदर से शुरू होता,
समंदर के अथाह आंगन से बारिशें जुदा होकर,
आकाश के आंगन में घने काले घर बनाती हैं,
हवाओं से कर ठिठोली बादलों में उड़ती जाती हैं।
तो कैसा लगता होगा समंदर से जुदा होना,
बादलों में समा जाना।
अंत बारिशें कहां जमीं की हो ही पाती हैं,
नदियों के रास्ते समंदर में ही समाती हैं।
क्या मिलता है बारिशों को इस बंजारेपन से,
शायद यही तो जीवन का चक्कर बनाता है,
जीवन भी इंसान का बारिशों सा ही होता है,
समंदर से मां बाप ,
बादलों सा जीवन साथी
और धरती से बच्चों के साथ।
बच्चों के लिए जीवन जी के क्या खुद के वो हो पाते हैं,
मां बाप के छोड़ जाने से फिर वो भी तो वहीं जाते हैं ।
ये जीवन भी तो बारिशों सा ही होता है,
शुरू मिट्टी से होता है, खतम मिट्टी में होता है।
फिर क्यूं इसे खुद पर इतना गुमां होता है ।
बारिशों को देख कर ये सोचता हूं मैं,
जुदाई का गम बड़ा होता है,
या मिलन की खुशी?
👍👍
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