सच में क्या ? तन्हाई या जिंदगी

 तन्हाईयां कब किस मोड़ पर जिंदगी से जुड़ी? इस सवाल का जवाब शायद ही कोई दे पाए। पर सबकी जिंदगी का इक हिस्सा बनती जरूर हैं।क्या बड़ा आदमी क्या छोटा आदमी, अमीर गरीब जाति धर्म की सीमाओं के परे , बिना भेद भाव सबको सताती हैं। है ना...

कभी भी कहीं भी, ये चुप चाप आपकी बाहों में समा जाती हैं। और देखो बुलाया नहीं तुमने,पर कुछ यूं व्यवहार करती हैं कि तुमने बुलाया है, मुख्य अतिथि मन का बनाया है। हां अतिथि, कहां कब आएंगी ये तन्हाईयां कौन जान पाया है?

लेकिन अकसर जिंदगी का अहम वक्त हम इन्ही के साथ बिताते हैं। सच कहूं तो लगता है, इनके बिना जिंदगी जिंदा नहीं हो पाती। 

क्या कहा? कैसे? अरे तन्हाईयों में हम वह कर सकते हैं जो सबके सामने नहीं कर पाते।

हां सोचते हैं कि इनके सामने ये करेंगे वो करेंगे,पर ना हिम्मत होती है ना कर पाते।पर तन्हाईयों में सब, दरअसल तन्हाईयों में हम हम हो पाते हैं, खुल कर रोते हैं और खुल कर मुस्कुराने लगते हैं।सबके सामने लगा हुआ मुखौटा भी तो निकाल फेंकते हैं तन्हाईयों में ।

दरअसल हम जिंदगी भर इंतजार करते हैं, नहीं नहीं, तन्हा होने का नहीं, तन्हाईयों को किसी से बांट पाने का।

हम इसी के लिए तो दोस्त बनाते हैं, बेस्ट फ्रेंड बनाते हैं और....

हां हां सही पकड़े हैं, प्यार की तलाश करते हैं ।

काश ये तन्हाईयां किसी के साथ बांट पाते

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