पीला दुःख

विदा करना काश आसान होता ... विदा दुःख से जुड़ा ही रहता है,क्यूं? प्रकृति ने कितना मुश्किल बनाया है इसे, 

देखो ना कहां शाम विदा कर पाती है सुरज को खुशी से?

कैसे उदास पीलापन खुशनुा ऩीले अम्बर को घेर लेता है,

जानता है कि रात बिता के वो वापस आ जाएगा , फिर भी उदासी पूरे रात की । 

पत्ते भी कैसे हरे भरे खुश रहते हुए विदा से पहले पीली - भूरी उदासी से गुमसुम से हवा के झोंको में धरती के एक कोने से दूसरे कोने तक विचरते हैं।

हरे आम या लाल सेब कहां खुशी के रंग बिखेरते एक दिन उदास पीले हो कर धरती तो कभी मानव को तृप्त करते हैं।

तो क्या पीला रंग दुःख की सूचना देता है या विदा की?

मुझे याद है मृत्यु का तेरा पल भी पीला ही था, पूरा जिस्म कैसे पीला पड़ गया था, आग के हवाले करने के लिए सूखे पीले लकड़ी को छांटा गया था, फिर पीली आग ने तेरे जिस्म को साथ ले जा कर विदा के लम्हे को पूरा कर दिया था।

बहुत दिनों तक मेरे चेहरे पर वो आग की झलक छाई रही है।

अब भी वो आग मन की दीवार पर टंगी रहती है, धीरे धीरे ही सही अंदर कुछ कुछ मुझे जलाती ही रहती है, जाने कब तक या जीवन तक।

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