अकेलापन
"अभि, आज घर पे कोई नहीं है। सब शादी में चले गए"
"अच्छा"
"क्या अच्छा"
"तुम अब बता रही हो?"
"तो, पहले बताती तो क्या होता?"
"तो...कुछ नहीं।"
मै तुम्हारे पास आ जाता, वो कहना चाहता था,पर कह नहीं पाया। वो खुद को संभालकर बोला" तू क्यूं नहीं गई,
अरे जाना था, घूम लो चारो ओर दुनिया ।"
"तुम्हे पतो है ना , मुझे ये सब नहीं समझ आता।"शिवा बोल रही थी," अभि, तुम.." यहां होते तो कितना अच्छा होता.. वो कहते कहते रूक गई। वो जानती थी वो बोलेगी तो अभि खुद को रोक नहीं पाएगा। "क्या बोलो ?? चुप क्यूं हो जाती हो?" अभि ने पूछा।
"कुछ नहीं, तुम अकेलापन कैसे काटते हो" शिवा ने बात बदल दी।
"अकेलापन कुछ नहीं ,
खुद को खोज लो बस...." वो गंभीर आवाज में बोला।
फोन पर चुप्पी तोड़ते वो बोला " पर वो सफेद ड्रेस में कौन है वहां???" वो घरघराती आवाज में बोला।
"कहां"
"तुम्हारे पीछे"
"चल पागल कुछ भी ।"
"नहींं पर कुछ आवाज सुनी मैने"
"प्लीज अभि बस करो, मैं किचन की तरह डर के तुम्हारा हाथ नहीं पकड़ने वाली" शिवा मुस्कुरा के बोली।
कुछ लम्हे किस तरह मन पर जीत हासिल कर देते हैं, जो अकेलापन अंधेरे डर का अहसास कराता है वो कैसे यादों की खिड़कियों से झांकते उजालों से मुस्कुरा पड़ता है ।
फोन पर चुप भी कभी कभी बातें करती हैं ।
👍👍
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