बूंद सी जिंदगी
बारिश,बूंद और बादल
कैसे खुद ही कविता हो जाते हैं,
बूंद कहां कैद होना चाहती है?
हर बूंद की ख्वाहिश तो दरिया होना होता है ।
बूंद तो बस बादलों से आजाद हो कर आसमां का आंगन छोड़ देती है, उस आंगन को जहां वो कैद तो है ,सुरक्षित भी है।
वो अपना अस्तित्व भी रखती है,
पर फिर भी आजाद हो कर वो धरती के हरे भरे आंचल को ललचा जाती है ।बस शायद यही जिंदगी होती है ।
हम कब कहां कैसे आजादी की तलाश में बचपन का आंगन छोड़ कर बड़े होने की हरियाली में खो जाना चाहते हैं।
पर क्या बूंद बादलों के काले साये से धरती के हरियाले में खुशियों का दामन तलाश पाती है?
कहां भला , कभी धरती के आगोश में कीचड़ बनती है,
कभी नालों से नदियों का सफर उसे आराम कहां बदा करता है।
नदियां उसे स्वर्ग सा समंदर बनाने का ख्वाब दिखाकर पत्थरों,बांधों के हवाले तोड़ती भी है ओैर कभी गंदे जिंदा जिस्मों से तो कभी मरे जिस्मों से जोड़ उसे नरक का आभास देती है ।
कुछ ऐसा ही जिंदगी के साथ भी होता है,
स्वर्ग की खुशियों की खातिर नरक सी जिंदगी हम खुद ही बुनते हैं।
बादलों सी मां और आसमां सा पिता कैद नहीं होता , से समझते समझते हम दरिया तक पहुच जाते हैं ।
Superb💖
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