प्यार, चुप्पी और बारिश

"नीली छतरी पर काला आसमां छाया था,
ना थी ये रात अंधेरी,
बारिशों ने बादलों से प्रेम कुछ रचाया था,
काले घने बादलों से नीला आसमां,
कुछ छुपा और घबराया था,
नीली छतरी के नीचे छुपी इस लड़की को,
इन अंधेरों ने थोड़ा डराया था"
वाव अभि, देखो मैं भी तुम्हारे साथ रहते - रहते कविता कहने लगी। आज शिवा बोल रही थी बारिशों की तरह,हल्की ठंडी हवा और बारिशों की फुहार से बचता अभि सोच रहा था।
शिवा" क्या हुआ?"
"कुछ नहीं"
"चुप क्यूं हो?तुम चुप रहते हो तो दिल डर जाता है ।
बोलो ना"
"अच्छा जी,पता है चुप रहने वाल पति लड़कियां खोजती हैं,
तुम्हें तो खुश होना चाहिए।" अभि शरारत भरी आंखों से बोला।
शिवा चुप थी..
थोड़ी देर चुप रह कर बोली
"मुझे घर छोड़ दो।"
अभि
"बारिश थमने दो,..
..
अच्छा नहीं करूंगा ऐसी बात । सॉरी।" कान पकड़ते हुए अभि बोला।
"अभि, छ: महीने मेरे पास हैं।तुम चाहो तो सुकून से बिता लो या परेशान करके।" शिवा उदास होकर बोली।
"मैं तो परेशान करूंगा,"
अभि उदासी छुपाते हुए बोला।
"क्यूं अभि?" मासूमियत को भी अपने आप पर दया आ जाए कुछ यूं शिवा ने चेहरा बनाया।
ये चेहरा अभि को शिवा के चेहरे पर हमेशा बेहोश करने वाला लगता था, इसी चेहरे ने अभि की रात की नींद भी कम कर दी।
अभि ने शिवा से कहा था कि "ये चेहरा जैसे प्यार करने को मजबूर करने वाली सीढ़ी थी । इसी चेहरे से वो प्रेम के छत पर चढ़ गया था" शिवा भी ये जानती थी ।जब तब वो इसका प्रयोग कर अभि को अपना कर दुःख कम करने की कोशिश करती,जबसे वो जान गई थी कि वो कभी एक नहीं हो पांएंगे।
"अरे यार,तेरे जाने के बाद ,ये शरारतें,तुझे परेशान करना ,
यही तो साथ रहेगा। तुम कहां..."
कहते कहते वो रूक गया।
बारिश बंद हो गई थी,
बारिश को भी पता होता है शायद,की प्रेम में कब चुप्पी छाने वाली है,तभी छाए बादल छंट जाते हैं।
प्रेम की गरमाहट भरी चुप्पी की तरह धूप आसमां के चेहरे पर पसर जाती है।


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