पिता ,भाग१

पिता की भूमिका कितनी आसां है,
करना ही क्या है दिन भर ..
बाहर की दुनिया में,
हंसी ठठका..नैन मटक्का..
पान गुटखा..चाय साय..
सुबह के उजालों से शाम के धुंधलकों तक..
लोगों की चिलमी,
आफिस की कलमी,
दूर दराज की गलियां,
पौधों की टूटती फलियां..
घर के कोनों में
थाली और दोनों में..
खाना और पीना..
घूरना या सोना..
टी.वी. या रेडियो..
मोबाइल या वीडियो..
बीवी पर रौब..
बच्चों पर खौफ..
चुप्पी या दूरी..
पैसों की मजबूरी..
हंसना या रोना..
बात  की बात पर 
बीवी या बच्चों पर..
कहना और सुनना..
बात बिना बात धोना..
है ना ये सबका..
पापा पर रोना ।
पर देखना कभी गौर से क्या होता है ..
बाप..या पिता होना।
....
शेष है कलमकारी(कवित)

Comments

Popular Posts